Thursday, 10 December 2020

प्लेटो का शैक्षिक दर्शन part 5

 प्लेटो का शैक्षिक दर्शन



शिक्षा का अर्थ

प्लेटो के अनुसार शिक्षा से अभिप्राय उस प्रशिक्षण से है जिससे अच्छी आदतों के द्वारा बालकों में नैतिकता का विकास होता है इन्होंने शिक्षा को एक नैतिक शिक्षण माना है जिनके द्वारा व्यक्ति की प्रवृत्तियों को सुधारा जा सकता है यह भी शिक्षा को सत्यम शिवम सुंदरम का साधन मानते हैं

शिक्षा के उद्देश्य

1  ईश्वर को जानना शिक्षा का यह दायित्व है कि वह बालक को इस योग्य बनाएं कि वह ईश्वर के साथ आत्मसाक्षात्कार कर सकें।
2  सत्यम शिवम सुंदरम के प्रति आस्था को उत्पन्न करना प्लेटो ने शिक्षा का प्रारंभिक उद्देश्य सत्यम शिवम सुंदरम को विकास माना है तथा उसे प्रारंभिक शिक्षा के समान ही प्राप्त करने पर बल दिया है
3   व्यक्तित्व का विकास करना प्लेटो के अनुसार शिक्षा द्वारा ऐसा जीवन निर्माण करना है जो प्रेम न्याय और सौंदर्य का जीवन हो
4   नागरिकता के गुणों का विकास मानव जीवन में संतुलन स्थापित करना
5  शिक्षा का लक्ष्य बालक द्वारा मानव में व्याप्त विरोधी तत्व को पहचानना तथा इसमें संतुलन स्थापित करना होना चाहिए

शिक्षा की पाठ्यचर्या

प्लेटो प्रथम शिक्षा शास्त्री हैं फिर दार्शनिक हैं प्लेटो के अनुसार पहले वर्षों में अंकगणित जेमिति संगीत नक्षत्र विद्या की कुछ बातें सीखनी चाहिए माध्यमिक स्तर पर वह खेलकूद व्यायाम शैक्षिक प्रशिक्षण गणित कविता तथा धर्म शास्त्र के शिक्षा पर बल देते हैं उच्च स्तर की पाठ्यचर्या में प्लेटो DIELECTRIC को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान देते हैं जिसका अर्थ होता है सत्य की खोज इसी के प्रशिक्षण से व्यक्ति दार्शनिक बन सकता है।

प्लेटो के अनुसार शिक्षण विधि

  • वाद विवाद विधि
  • प्रश्नोत्तर विधि
  •  वार्तालाप विधि 
  • प्रयोगात्मक विधि 
  • स्वाध्याय विधि

प्लेटो के अनुसार शिक्षक

प्लेटो ने शिक्षक को महत्वपूर्ण स्थान दिया है उनके अनुसार शिक्षक आदर्श गुणों से युक्त और अनुभवी होना चाहिए जिससे वह शिक्षा का कार्य अच्छे से कर सकें प्लेटो स्वयं शिक्षक थे इन्होंने दार्शनिकों को ही समाज का कर्णधार माना है।

प्लेटो के अनुसार अनुशासन

प्लेटो का विश्वास था कि बालक स्वभाव से ही नियमों में बंधा नहीं रहना चाहता नियंत्रण में रखने के लिए उसे दंडवा पुरस्कार भी देना चाहिए प्लेट को मुक्त आत्मक अनुशासन के विरोधी थे इनके अनुसार बालक को एक निश्चित सीमा में स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।

प्लेटो के अनुसार विद्यालय

प्लेटो ने शिक्षा की प्रेरणा सुकरात से ली थी। प्लेटो ने एकेडमी नामक संस्था को शिक्षा प्रदान करने का केंद्र बनाया क्योंकि यह निश्चित स्थान पर शिक्षा प्रदान करने के समर्थक थे इनके अनुसार विद्यालय मानवीकरण एवं सामाजिकरण करने वाली संस्था है जो बालक को सहयोगी और सामाजिक जीवन व्यतीत करने की कला सिखाती है

 प्लेटो का शिक्षा में योगदान

प्लेटो ने ही सबसे पहले चश्मा अवस्था से लेकर संपूर्ण जीवन शिक्षा योजना सुव्यवस्थित ढंग निर्मित करके प्रस्तुत की।

 प्लेटो ने शिक्षा में आदर्शवादी दृष्टिकोण का समावेश किया ।प्लेटो ने शिक्षा को बुद्धि विभेद के आधार पर देने की योजना प्रस्तुत की ।

प्लेटो ने संगीत की शिक्षा व शारीरिक शिक्षा को समझने का प्रयास किया ।

प्लेटो ने स्त्रियों और पुरुषों को शिक्षा में समान स्थान देने की बात की उनका यह विचार आधुनिक विचारधारा के अनुकूल है।

 प्लेटो ने शिक्षा संबंधी सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप प्रदान किया इसके लिए उन्होंने अकैडमी नामक संस्था की स्थापना की। प्लेटों दार्शनिकों में एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं।

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Monday, 7 December 2020

शिक्षा में आदर्शवाद प्लेटो का जीवन परिचय part 5

 शिक्षा में आदर्शवाद 
प्लेटो का जीवन परिचय 


मुख्य पुस्तकेे
  • द रिपब्लिक
  •  द लॉज
  • प्रोटागोरस
  • सिंपोजियम
  • टिमियस
  • क्रिटिक्स
  • क्राइटो
  • एपालॉजी
  • द स्टेटस मैन

 शिक्षा में आदर्शवाद

 

पाश्चत्य शिक्षा के इतिहास में प्लेटो  का महत्वपूर्ण स्थान है प्लूटो का जन्म 427 ईसा पूर्व एथेंस में हुआ था इनके पिता का नाम एयरस्टोन था इनका जन्म एथेंस के एक कुलीन परिवार में हुआ था जिसके कारण उनका प्रारंभिक नाम एरिस्टोकिल्स पड़ा बाद में वे प्लेटो के नाम से विख्यात हुए प्लेटो बचपन से ही प्रतिभावान बालक थे कविता, ग्रीक साहित्य ,दर्शन एवं खेलों में उनकी विशेष रूचि थी प्रारंभ में हेराक्लीटस के शिष्य क्रेटीलस से प्लेटो ने शिक्षा प्राप्त की थी 20 वर्ष की अवस्था में उसने अपने गुरु सुकरात से भेंट की और लगभग 8 वर्ष तक उनके संपर्क में रहा उसके किशोर एवं फ्रॉड मस्तिष्क पर सबसे अधिक प्रभाव सुकरात का पड़ा इनके शिक्षा संबंधी विचारों पर सुकरात  सोफ़िटो, स्पार्टा की शिक्षा पद्धति तथा एथेंस की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का विशेष प्रभाव पड़ा 399 ईसवी पूर्व में सुकरात के दिए गए मृत्युदंड से आहत लेटर में एथेंस छोड़ दिया था 40 वर्ष की अवस्था में वह पूर्ण स्वदेश लौटा और वहां 386 ईसवी पूर्व में इसमें एक शिक्षा पीठ खोला जिसमें वह जीवन पर्यंत अध्ययन कार्य करते रहें शिक्षा पीठ महिला दोनों के लिए खुला था तथा इसमें दर्शनशास्त्र गणित और विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी मानव विज्ञान के अध्ययन के लिए स्थाई संस्था के रूप में प्लेटो ने शिक्षा पीठ स्थापित किया था उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना भी की इनकी मृत्यु 347 ईसवी पूर्व में हुई 


प्लेटो की प्रमुख रचनाएं

प्लेटो के दार्शनिक एवं शिक्षा संबंधी विचारों का अध्ययन उनकी कृतियों द्वारा किया जा सकता है

प्लेटो की विभिन्न पुस्तकें जिनमें निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं

शिक्षा पर जिन जिन दार्शनिक विचार धाराओं का प्रभाव पड़ा मुख्य रूप से उनकी संख्या 4 है आदर्शवाद उन्हीं में से एक प्रमुख और सबसे प्राचीन विचारधारा है। प्रारंभ से ही यह विचारधारा शिक्षा को प्रभावित करती आ रही है इस विचारधारा के मुख्य समर्थक सुकरात थी परंतु इस को विस्तृत करने का कार्य उनके शिष्य प्लेटो ने किया । 

अर्थ और परिभाषा

आदर्शवाद को अंग्रेजी में आइडियलिज्म कहते हैं यह दो शब्दों से मिलकर बना है पहला शब्द idea दूसरा शब्द lsim ।

Idea का अर्थ विचार तथा ism का अर्थ है वाद इस तरह आइडियलिज्म का अर्थ हुआ विचार वाद वास्तव में आइडियलिज्म विचार वाद होता है। 

परिभाषाएं

डीएम दत्ता के अनुसार "आदर्शवाद वह सिद्धांत है जो आध्यात्मिक सत्ता को मानता है"

रास के अनुसार "आदर्शवादी दर्शन के अनेक और विविध रूप हैं पर सब का आधारभूत तत्व यह है कि संसार का आवश्यक उत्पादन मन या आत्मा है और वास्तविक सत्य मानसिक स्वरूप का है"

आदर्शवाद के आधारभूत सिद्धांत

भौतिक जगत की अपेक्षा में आध्यात्मिक जगत की अपेक्षा अधिक हैं

आदर्श वादियों ने संपूर्ण जगत को दो भागों में बांटा है 1 भौतिक जगत 2 आध्यात्मिक जगत  इनमें से उन्होंने भौतिक जगत की अपेक्षा आध्यात्मिक जगत को अधिक सत्य माना उनके अनुसार भौतिक जगत आध्यात्मिक जगत की झलक मात्र है आदर्शवादी सत्ता ही सबसे बड़ी सत्ता है जिसे समझने के लिए सारा संसार प्रयत्नशील है जिसको समझना जीवन का परम लक्ष्य है

 जड़ प्रकृति की अपेक्षा मानव प्राणी अधिक महत्वपूर्ण है

आदर्श वादियों में जड़ प्रकृति की अपेक्षा महत्व माना है क्योंकि मानव प्राणी बुद्धि युक्त है बुद्धि के द्वारा ही वह परमात्मा के चमत्कार को आभास करता है

वस्तु कीअपेक्षा विचार अधिक महत्वपूर्ण

आदर्शवाद वस्तु की अपेक्षा विचारों को विचारों को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे उनके अनुसार विचार ही सकते और वास्तविक है वस्तु नहींं इसी सत्य और वास्तविक विचारों मेंं संपूर्ण जगत के समस्तत तत्व निहित हैं 


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Saturday, 5 December 2020

शिक्षा के विभिन्न अंगों पर दर्शन का प्रभाव part 4

शिक्षा के विभिन्न अंगों पर दर्शन का प्रभाव

 शिक्षा के उद्देश्यों पर दर्शन का प्रभाव

 शिक्षा को एक स्वदेश प्रक्रिया कहां गया है क्योंकि शिक्षा का कोई ना कोई उद्देश्य जरूर होता है अन्यथा शिक्षा व्यर्थ मानी जाती है शिक्षा का उद्देश्य जीवन  के लक्ष्य पर निर्भर करता है परंतु जीवन लक्ष्य दर्शन के द्वारा निर्धारित किया जाता है दर्शन के द्वारा उद्देश्य काल तथा परिस्थितियों की विचारधारा और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार जीवन के लक्ष्य दर्शन के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं

उदाहरण के स्वरूप.                                                             प्राचीन काल में भारत में धर्म ही जीवन का आधार और कर्म क्षेत्र था उस समय जीवन का प्रमुख लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति था जिसकी प्राप्ति के लिए शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य आत्मशक्ति का विकास चरित्र निर्माण और आध्यात्मिक विकास माना गया है

शिक्षा के पाठ्यक्रम पर दर्शन का प्रभाव

शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण किया जाता है पाठ्यक्रम पर भी दार्शनिक विचार धाराओं पर प्रभावों का पड़ना स्वाभाविक है पाठ्यक्रम का निर्माण देश या समाज की तत्कालीन विचारधाराओं के अनुकूल होता है अतः पाठ्यक्रम में उन्हीं विषयों को रखा जाता है जो उन विचारधाराओं के पोषक हूं तथा उन अवस्थाओं की पूर्ति में सहायक हो।

शिक्षण विधियों पर दर्शन का प्रभाव

शिक्षण विधियों को निर्धारित करने में भी दर्शन का बहुत प्रभाव पड़ता है इनकी सफलता उपयुक्त शिक्षण विधियों पर ही निर्भर होती है शिक्षण विधियां ही वह माध्यम हैं जिनके द्वारा छात्र और विषय सामग्री के संबंध स्थापित किए जाते हैं दर्शन का आधार ना होने के कारण शिक्षा विधि प्रभावशाली हो सकती है अतः शिक्षण विधियों का निर्माण दर्शन के आधार पर ही निर्माण किया जाना चाहिए।

 पाठ्य पुस्तकों पर दर्शन का प्रभाव

शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पुस्तकों का विशिष्ट महत्व है पुस्तकों के द्वारा ही बालकों का भावनात्मक विकास होता है और उनमें निश्चित आदर्श उत्पन्न होते हैं अतः पुस्तकों की रचना दार्शनिक विचार धाराओं को ध्यान में रखकर की जाती है दार्शनिक विचार धाराओं पर ही यह निश्चित होता है कि शिक्षा में पाठ्य पुस्तकों की आवश्यकता है कि नहीं

शिक्षक पर दर्शन  का प्रभाव

"स्पेंसर के अनुसार वास्तविक शिक्षा का संचालन दार्शनिक के द्वारा ही संभव है"

स्पष्ट है कि शिक्षक को दर्शन का अच्छा ज्ञाता होना चाहिए क्योंकि जो शिक्षक शिक्षा दर्शन को नहीं जानता वह सफलतापूर्वक शिक्षण कार्य नहीं कर सकता दर्शन के द्वारा ही शिक्षा के ज्ञान का विस्तार होता है और विचारों में परिपक्वता आती है शिक्षा के विभिन्न अंगों पर दर्शन का प्रभाव होता है और इनका संचालन शिक्षक होता है अतः निहित विचारधारा का प्रभाव शिक्षक पर पड़ना स्वाभाविक

शिक्षण संस्थानों पर दर्शन का प्रभाव

शिक्षा की औपचारिक संस्था विद्यालय तथा अनौपचारिक संस्था ग्रह और समुदाय आदि पर सभी पर दर्शन का प्रभाव होता है परिवार के सभी सदस्य अपनी शिक्षा के आधार पर अपना जीवन दर्शन निश्चित करते हैं आदर्शवादी और प्रकृति वादी विचारधारा के फल स्वरुप ही शांतिनिकेतन गुरुकुल आदि विद्यालयों की स्थापना हुई है

शैक्षिक मापन और मूल्यांकन प्रदर्शन का प्रभाव

शिक्षा में मापन और मूल्यांकन पर भी दर्शन का प्रभाव पड़ता है इस विचारधारा के प्रारंभ का श्रेय मैकाले को जाता है इनके अनुसार यदि शैक्षिक मापन को महत्वपूर्ण और प्रभावपूर्ण बनाना मां को को केवल तकनीकी ही नहीं होना चाहिए बल्कि उनके पीछे दर्शन भी होना चाहिए

अनुशासन पर दर्शन का प्रभाव

शिक्षा दर्शन का अनुशासन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है किसी देश काल में अनुशासन का स्वरूप क्या है और क्या होगा उस देश के कालवा दार्शनिक विचारधारा पर निर्भर करता है देश और काल की विचारधारा में समय-समय पर अपने ढंग से निर्धारित किया गया और उसी के अनुसार अनुशासन की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया।

निष्कर्ष 

दर्शन और शिक्षा के पारस्परिक संबंध पर विचार करने पर यह ज्ञात होता है कि दर्शन और शिक्षा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं यदि एक में परिवर्तन होता है तो दूसरे में स्वयं ही परिवर्तन हो जाता है शिक्षा के समर्थकों पर शिक्षा का प्रभाव दिखाई पड़ता है इस प्रकार दर्शन को यदि एक प्रकार का शिक्षा का मूल आधार कहा जाए तो गलत नहीं होगा।


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Wednesday, 4 November 2020

सामुदायिक कार्य (community work)

 सामुदायिक कार्य 





सामुदायिक कार्य का अर्थ एवं परिभाषा


सामुदायिक सेवा एक ऐसी योजना है जो सहयोग सहायता एवं सहकारिता इत्यादि सिद्धांतों के आधार पर सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति पर बल देता है। यह एक ऐसा भाव है जो कार्य या सहयोग के बदले में किसी भी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता है अर्थात निस्वार्थ सेवा करता है समुदाय शब्द लैटिन भाषा के com+munis से मिलकर बना है जिसमें com का अर्थ है together अर्थात साथ-साथ तथा munis अर्थ है serving अर्थात सेवा करना ।
आईसी जैक्सन के अनुसार सामुदायिक सेवा किसी समुदाय को अपने आप काम करने के लिए प्रोत्साहित करने तथा भौतिक और आध्यात्मिक रूप से सामुदायिक जीवन को समूह बनाने के लिए कार्य करने को प्रेरित करता है

सामुदायिक कार्य के उद्देश्य

• सामुदायिक कार्य के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों से जन सहयोग प्राप्त करना सामुदायिक कार्य के माध्यम से जन कल्याण हेतु कार्य करना समाज में व्याप्त सामाजिक समस्याओं को पहचान कर उसका निराकरण हेतु समाधान सुझा ना सामुदायिक सेवाओं के माध्यम से सामाजिक जीवन से जुड़ना स्वयं सेवा की भावना का विकास करना सामुदायिक कार्य में प्रत्येक आयु वर्ग के व्यक्ति सम्मिलित होकर कार्य करते हैं।
सामुदायिक कार्य की प्रकृति
समाज सुधार को बढ़ावा देना आपसी मतभेद को दूर कर सहयोग एवं सहकारिता की भावना का प्रचार एवं प्रसार करना सामुदायिक समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना समुदाय के लोगों में सामाजिक तथा जनकल्याण की भावना का प्रसार करना सार्वजनिक कल्याण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सामाजिक जागरूकता का प्रसार करना जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रारूप तैयार करना तथा क्रियान्वयन हेतु सामाजिक जागरूकता का प्रसार करना शिक्षण संस्थाओं में छात्र संगठनों को सामुदायिक सेवा हेतु प्रोत्साहन देना समाज में एकता की भावना को बढ़ावा देना।

सामुदायिक कार्य का क्षेत्र

समुदाय का व्यवसायिक मार्गदर्शन समुदाय के द्वारा शैक्षिक विकास शिक्षा के प्रति जागरूकता तथा प्रौढ़ शिक्षा का प्रचार प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक आर्थिक एवं शैक्षिक इत्यादि के संदर्भ में जागरूकता का प्रसार उपभोक्ता संरक्षण सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन का प्रयास रूढ़िवादिता के उन्मूलन का प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा तथा शिक्षा स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाना वृक्षारोपण एवं सामाजिक कार्यक्रम का प्रसार करना सामुदायिक मनोरंजन की व्यवस्था करना समाज से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास

सामुदायिक कार्य का महत्व
विचारों में नवीनता आती है एक साथ कार्य करने एक दूसरे को प्रोत्साहन देते हैं जिस प्रकार किसी वस्तु को पकड़ने के लिए एक उंगली नहीं बल्कि पूरी पांचों उंगलियों की जरूरत पड़ती है उसी प्रकार सामुदायिक कार्य समाज में एकता बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है सामुदायिक कार्य के द्वारा सामाजिक भावना की जागृति होती है सामुदायिक कार्य आपसी मतभेद को भुलाने में सहायता करता है प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों में आपसी प्रेम बढ़ता है किसी भी कार्य को एक समुदाय में करने से कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाता है मानव के कल्याण के लिए सामूहिक होना अति आवश्यक है

सामुदायिक कार्य के प्रकार
प्रकृति के महत्व को बताते हुए पेड़ पौधे लगाने के लिए जागरूक करना यातायात के नियमों का पालन करने के लिए जागरूक करना नुक्कड़ नाटक पोस्टर स्लोगन आदि के माध्यम से सामाजिक समस्याओं पर सामुदायिक कार्य के माध्यम से जागरूक करने का प्रयास करना साफ सफाई के माध्यम से बीमारियों से बचाव के लिए जागरूक करने का प्रयास करना सर्वधर्म समानता के लिए जागरूक करना शारीरिक रूप से विकलांग मानसिक रूप से विक्षिप्त बालकों के प्रति जागरूकता कार्यक्रम करना शक्ति के महत्व को बताते हुए पेड़ पौधे लगाने के लिए जागरुक करना यातायात के नियमों का पालन करने के लिए जागरुक करना नुक्कड़ नाटक पोस्टर स्लोगन आधी के माध्यम से सामाजिक समस्याओं पर सामुदायिक कार्य की माध्यम से जागरुक करने का प्रयास करना साफ-सफाई के माध्यम से बिमारियों से बचा ओके लिए जागरुक करने का प्रयास करना सर्व धर्म समानता के लिए जागरुक करना शारीरिक रूप से विकलांग मानसिक रुप से विकसित बाल को के प्रति जागरुकता कार्यक्रम करना ताकि उन्हें भी समाज में सामान लोगों की तरह स्नेह एवं प्रेम दिया जाए hiv एक पूजा दी खतरनाक बीमारियां के प्रति जागरुक करना

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Monday, 2 November 2020

विशिष्ट विद्यालय (special school)

 



विशिष्ट  विद्यालय 

 प्रस्तावना

परत बालक में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो जन्मजात पाए जाते हैं यह ग्रुप हराया अनुवांशिकता से संबंधित भी हो सकते हैं अथवा नहीं भी इन्हीं गुणों के आधार पर ही बालकों का शैक्षिक स्तर निर्भर करता है सामान्य वालों को का शैक्षिक स्तर उनकी बुद्धि लब्धि तथा क्षमताओं के आधार पर ही तय किया जाता है ठीक इसी प्रकार वह बालक जो कि विशिष्ट बालक होते हैं उन्हें भी शिक्षा के पूर्ण अवसर प्राप्त करने का अधिकार होता है इन बालकों को दी गई शिक्षा अलग-अलग प्रकार की होती है क्योंकि इन बालकों का शैक्षिक स्तर अलग अलग होता है समावेशी शिक्षा एक प्रणाली है शिक्षा का समावेशी करण यह बताता है कि विशेष शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक सामान्य छात्र एक दिव्यांग छात्र के साथ विद्यालय में अधिकतर समय बिताता है पहले समावेशी शिक्षा की परिकल्पना सिर्फ विशेष छात्रों के लिए की गई थी लेकिन आधुनिक काल में हर शिक्षक को इस सिद्धांत को विस्तृत दृष्टिकोण में अपनी कक्षा में व्यवहार में लाना चाहिए समावेशी शिक्षा या एकीकरण के सिद्धांत की ऐतिहासिक पद्धति की जगह नई शिक्षा नीति का प्रयोग आधुनिक समय में होने लगा है समावेशी शिक्षा विशेष विद्यालय या कक्षा को स्वीकार नहीं करता अशक्त बच्चों को सामान्य बच्चों से अलग करना अब मान्य नहीं है दिव्यांग बच्चों से अलग करना मन नहीं है दिव्यांग बच्चों को भी सामान्य बच्चों की तरह ही शैक्षिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार है




विशिष्ट विद्यालय का अर्थ एवं अवधारणा

विशिष्ट शिक्षा से अभिप्राय उस शिक्षा से है जो विशिष्ट बालकों को दी जाती है वह शिक्षा जो प्रतिभाशाली युवा पिछड़े बालकों को दी जाती है विशिष्ट बालकों की सामान्य बालक को से भिन्न शैक्षिक मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है
शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय कोष के अनुसार वह शिक्षा जो इन बच्चों को दी जाती है जो विशेष शैक्षिक उपचार की इसलिए अपेक्षा करते हैं क्योंकि या तो वे प्रतिभाशाली हैं या शारीरिक या मानसिक दृष्टि से विकलांग है और यह शैक्षिक दृष्टि से सामान्य से भिन्न है
जेडी हंट के अनुसार" विशिष्ट शिक्षा व शिक्षा है जो शारीरिक संवेगात्मक या सामाजिक विशेषताओं में सामान्य बालकों की शिक्षा से अलग है।"

विशिष्ट विद्यालय की आवश्यकता एवं महत्व
किसी भी कक्षा में विभिन्न तरह के बच्चे होते हैं जिनकी अपनी अपनी आवश्यकताएं हो सकती हैं जैसे कुछ बच्चे अक्षरों को उल्टा लिखते हैं कुछ की श्रवण शक्ति कम होती है कुछ मंदबुद्धि वाले होते हैं सभी बच्चे सामान्य गति से नहीं सीख पाते हैं कुछ बच्चों का उच्चारण फर्स्ट नहीं होता है जिसके कारण इन बच्चों का विकास एवं दैनिक कार्यशीलता प्रभावित होती है। इन अभिनेताओं के कारण इन बच्चों के पालन पोषण में कुछ भिन्न या विशिष्ट तरीके अपनाने की आवश्यकता होती है उनकी शिक्षा के लिए विशेष योजना बनानी पड़ती है यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि उनके अनुकूलतम विकास को बढ़ावा मिले अभिभावकों और शिक्षकों को इन बच्चों को बोलना लिखना चलने फिरने मित्र बनाने और कौशल और संकल्पना ए जो सामान्य बच्चों के विकास के दौरान सहज रूप से प्राप्त कर लेते हैं उन्हें अर्जित कराने और सिखाने के लिए विशेष प्रयास करने होते हैं इन बच्चों की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो अधिकांश बच्चों की जरूरतों से भिन्न होते हैं अर्थात उनकी विशेष जरूरत।


विशिष्ट विद्यालय के उद्देश्य
प्रतीक शिक्षा व्यवस्था या संस्था के कुछ लक्ष्य बहुत तेज होते हैं इसी प्रकार विशिष्ट शिक्षा भी सामान्य शिक्षा की तरह देश के विकास समाज का पुनर्गठन नागरिक विकास समाज में फैली बुराइयों मिटाने आदि विभिन्न प्रकार के उद्देश्य लेकर चलती है इन उद्देश्यों के अतिरिक्त विशिष्ट शिक्षा के कुछ निम्नलिखित उद्देश्य है
• विशिष्ट बच्चों की विशेष आवश्यकताओं की पूर्व पहचान तथा निर्धारणकरना
• शारीरिक रूप से बाधित बालकों का पुनर्वास करना
• विशिष्ट शिक्षा का मुख्य उद्देश्य विशेष बच्चे का सर्वांगीण विकास करना है
• विशेष बच्चों को किस प्रकार का वातावरण प्रदान करना जिससे देश देश की मुख्यधारा से जुड़े रह सकें
उनको सामान्य विकास के लिए तैयार करना उनको इस योग्य बनाना कि वे जीवन की समस्याओं का साहस व आत्मविश्वास से सामना कर सकें।
कुछ क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने वाली विभिन्न नेताओं के बावजूद विशिष्ट बच्चे कई प्रकार से अपनी आयु के सामान्य बच्चों के समान होते हैं।


विशिष्ट शिक्षा का महत्व


• विशिष्ट शिक्षा विशेष बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करती है चाहे वह बच्चा प्रतिभाशाली हो या पिछड़ा
• विशिष्ट शिक्षा विशिष्ट बच्चों को समाज के साथ समायोजन में सहायता करती है
• विशिष्ट शिक्षा विशिष्ट बच्चों की पहचान व निदान में सहायक है
• विशिष्ट शिक्षा की प्रकृति विकासात्मक है विशिष्ट शिक्षा विशिष्ट बालकों को आत्मनिर्भर बनाती है तथा उनमें आत्मविश्वास का संचार करती है।
• विशिष्ट शिक्षा प्रदान करने के लिए विशेष शिक्षा सामग्री विशेष पाठ्यक्रम व विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापकों की आवश्यकता होती है।
• यह शिक्षा बालकों की क्षमताओं योग्यताओं रुचि युवा कवियों को ध्यान में रखकर दी जाती है
• विशिष्ट शिक्षा लोगों के विशिष्ट बालकों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव लाती हैं।




विशिष्ट विद्यालय के प्रकार
Special school for children with physical disability
Special school for social development
special school for children with intellectual disability
Hospital School


विशिष्ट विद्यालय की विशेषताएं
विशिष्ट शिक्षा की पहुंच दूर-दूर तक है विशिष्ट शिक्षा की प्रकृति उपचारात्मक है विशिष्ट शिक्षा उपचारात्मक होने के साथ-साथ विशिष्ट बालकों की विशिष्टता की पहचान है विशिष्ट शिक्षा विशिष्ट बालकों को एक विश्वसनीय वातावरण प्रदान करती है जो कि उसकी विशिष्टता को समायोजित करने में सहायता प्रदान करता है विशिष्ट शिक्षा किसी एक की विशेषता पर केंद्रित होती है तथा कहने का तात्पर्य किसी एक आवश्यकता पर अपना ध्यान केंद्रित कर उसे पूरा करती है।
विशिष्ट शिक्षा विकास उन्मुख भी है इसमें विशिष्ट बालकों के विकास से संबंधित जितनी भी विषय हैं उन सभी को अपनाया जाता है विशिष्ट शिक्षा प्रयोगों पर अत्यधिक आधारित है इसमें विशिष्ट बालक की शिक्षा हेतु मानविकी करण को प्रोत्साहित किया जाता है विशिष्ट शिक्षा विशिष्ट बालको और सामान्य बालकों में पहचान के अंतर को स्पष्ट करती है विशिष्ट बालक को विशिष्ट शिक्षा की सहायता से अधिगम हेतु स्वास्थ्य अनुकूलित वातावरण प्रदान किया जाता है विशिष्ट शिक्षा तकनीकी पर अधिक से अधिक निर्भर होती है इस निर्भरता के साथ साथिया शिक्षा विशिष्ट बालकों के लिए विशिष्ट उपकरणों व यंत्रों के भी प्रयोग पर जोर देते हैं तकनीकी उपयुक्त विद्या शिक्षण सामग्री के मेलजोल से कक्षा गत परिस्थितियों के अंतर्गत अधिगम हेतु सुगम वातावरण तैयार किया जा सकता है विशिष्ट शिक्षा माता-पिता व अभिभावकों को भी विशिष्ट बालकों के विषय में जानने में सहायता प्रदान करती है विशिष्ट शिक्षा शिक्षक को विशिष्ट बालक के मनोविज्ञान को समझने में अधिक से अधिक सहायता प्रदान करती है।












 

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Wednesday, 28 October 2020

Book review science text book class 6th


























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Saturday, 24 October 2020

book review biology in English class 7th

 book review biology in English class 7th























 

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